ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के। ये लुटते हुवे कारवाँ जिन्दगी के।
कहाँ हैं कहाँ हैं मुहाफिझ खुदी के, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं।
ये पुरपैंच गलियाँ ये बदनाम बाजार। ये गुमनाम राही ये सिक्कों की झंकार।
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार, जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं।
ये सदियोंसे बेखौफ सहमी सी गलियाँ। ये मसली हुई अधखिली जर्द कलियाँ।
ये बिकती हुई खोखली ...