तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मकाम से गुज़र
मिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र, पारेस-ओ-शाम से गुज़र
जिस का अमाल है बे-गरज़, उस की जज़ा कुछ और है
हूर-ओ-ख़याम से गुज़र, बादा-ओ-जाम से गुज़र
गर्चे है दिलकुशा बहोत हुस्न-ए-फ़िरन्ग की ...
तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मकाम से गुज़र
मिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र, पारेस-ओ-शाम से गुज़र
जिस का अमाल है बे-गरज़, उस की जज़ा कुछ और है
हूर-ओ-ख़याम से गुज़र, बादा-ओ-जाम से गुज़र
गर्चे है दिलकुशा बहोत हुस्न-ए-फ़िरन्ग की ...
निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले
है अहल-ए-दिल के लिये अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
बहोत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिये
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें, ...
तर काल आपण नवा-ए-सरोश पर्यंत पोहोचलो होतो; बादाख्वार आणि “गुहर होने तक” बद्द्ल नंतर बोलुया असं ठरलं होतं. गालिबची “ये न थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता,” ही गझल बर्यापैकी प्रसिद्ध आहे. त्या गझलेचा हा मक्ता:
ये मसाईले तसव्वुफ ये तेरा बयान गालिब,
हम तुझे वली समझते जो न बादाख्वार होता
ह्या तुझ्या अध्यात्माच्या गोष्टी, ही तुझी प्रवचनं गालिब – आम्ही तुला संत समजून बसलो ...
एक मराठी ब्लॉग असावा असं बर्याच दिवसांपासून मनात होतं, पण अनेक अडचणी निघत राहिल्या अन् मराठी ब्लॉगचं आपलं राहुनंच गेलं. आता सध्या असं आहे की इंग्रजीतले दोन ब्लॉग्स सांभाळणंच कठीण होऊन बसलंय, विशेषतः ग़ालिबाना, ते सगळं विषय जुळवणं, लिहिणं, टाईप करणं, प्रुफरीड करणं – कधीकधी इतकं सगळं करता करता काय लिहायचं त्याचा गाभाच निघुन जातो. त्यापेक्षा आपली मायबोली बरी, उचलली जीभ लावली ...
अन्ना हजारे जी का आमरण उपोषण आखिरमें कुछ तो दे गया… किसके खिलाफ था और किनके लीये था, गर थोडा सोचेंगे तो समझ आये भला….
कई सदी पहले एक उर्दू शायर हुआ करता था… बात उस ज़माने की है जब उर्दू हिंदी मानो जैसे गंगा जमुना थी. वैसे तो मुग़लिया सल्तनतमें अच्छे अच्छे शायरोंकी बड़ी रिवायत है. लेकिन इन्होने जो देखा शायद ही दुनिया में कोई और उसे देखा पाया. खैर. इनका नाम है नजीर अकबराबादी. अब ना वो ...
आदाब. शोमा खूब हास्तिद? मन खुबम.
अल्हमदुलिल्लाह. मर्सी.
बड़े दिन बाद अच्छा, कुछ खास सुनने मिला. जनाब फैजल शाह, जिन्होंने आय.ए.एस. में पिछले साल अव्वल नंबर लाया उनके कुछ अलफ़ाज़ मै यहाँ आपके सामने पेशे-ए-ख़िदमत करना चाहूँगा. आप वैसे तो कश्मिरसे है और पेशेसे डॉक्टर है. लेकिन आपने ...
बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कङ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा
दरवाज़ों पे लटके हुए बोसिदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़ !
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों ...
इस्लाम बद्दल जाणून घ्यायची इच्छा अपार. लहानपणापासून वाचले त्याचे इम्प्रेशन मनावर असते आपल्या सगळ्यांच्या… मग ती पाठ्याशाळेतील पुस्तके असो की ऐतिहासिक कादंबऱ्या बखरा असोत. कुठून तरी वायव्येकडच्या वाळवंटातून उंटांचे काफिले प्रवास करत आहे.. बदायुनी लोक रात्री एकत्र बसून शेकोटीभवती गाणी गात आहेत. किंवा मग असंच हिरवा झेंडा घेऊन कोणता तरी घोड्यांचा काफिला आरडा-ओरडा करत आला… ...
मोमीन खान मोमीन साहेबांची उत्कृष्ट गजल…
वो जो हममे तुममे करार था.. तुम्हे याद हो के न याद हो….
वो नये गिले वो शिकायते, वो मजेमजेकी हिकायते…वो हर एक बातपे रूठना… तुम्हे ...
परवाच अमिताभचा (जुना) दीवार बघत होतो (तोच तो, 'मेरे पास मां है' वाला). अमिताभचे डायलॉग्ज कसले एक से एक.
"तुम लोग मुझे ढूंढ रहे हो, और मैं तुम्हारा यहां इंतज़ार कर रहा हूं।"
"यह ताला मैं तुम्हारी जेब से चाभी निकालके खोलूंगा पीटर।"
"मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।"
"अगले हफ्ते एक और कूली पैसे देने से इन्कार करनेवाला है।"
"दोस्तोंके नाम भी हुआ करते हैं।"
"क्या तुम ...