देवनागरी
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Hindi

वो चांद... बुधवार, १२ मार्च २००८, १३:२९ (+०५:३०)

स्नेहा शोध स्वतःचाच...

वो चांद... चांदनीयोसे घेरा हुआ
फ़िर भी अकेला.. वो चांद...
ऑख़ मिचोली खेलता हुआ..
कभी निशब्द भिर भी कुछ गुनगुनाता हुआ..
चांदनीयोगा दिल बेहलाता हुआ..
वो चांद... चांदनीयोसे घेरा हुआ
फ़िर भी अकेला..
रोज नयी चांदनी...
दुनियाने चांद को खुश नसीब समझा..
चांद भी सिर्फ़ मुस्कुराया..
क्या बताता दुनीया को
हररोज उसकी एक चांदनी..
धरती को मिलने जाती थी..
सब चांद के साथ तो ...

क्यूं कहते हो गुरुवार, ०५ जुलै २००७, २३:५६ (+०५:३०)

Baba Potli Baba ki

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता
कोई सह लेता है कोई कह लेता है क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता
आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता