शोध स्वतःचाच...
वो चांद... चांदनीयोसे घेरा हुआ
फ़िर भी अकेला.. वो चांद...
ऑख़ मिचोली खेलता हुआ..
कभी निशब्द भिर भी कुछ गुनगुनाता हुआ..
चांदनीयोगा दिल बेहलाता हुआ..
वो चांद... चांदनीयोसे घेरा हुआ
फ़िर भी अकेला..
रोज नयी चांदनी...
दुनियाने चांद को खुश नसीब समझा..
चांद भी सिर्फ़ मुस्कुराया..
क्या बताता दुनीया को
हररोज उसकी एक चांदनी..
धरती को मिलने जाती थी..
सब चांद के साथ तो ...