शोध स्वतःचाच...
कागज़ के फ़ुल ..
कागज़ के फ़ुल आज़कल मेहेंगे हो गये है
असली फ़ुल तो फ़िर भी मुस्कुराते है
पर उस मुस्कान के पिछे
कुछ दर्दसा छुपा है जैसे
कागज़ के फ़ुल आज़कल मेहेंगे हो गये है..
सब अपने हिसाबसे जिते है इधर
हसते है बोलते है कभी चुप से होते है
अपनेही मर्जी के मालीक..