वो बैठे हैं रूबरू और शाम ढलने को है दरमियाँ का शीशा अब पिघलने को है छोड़ आया बीच मझधार यादों को तेरी डूबती यह नैया अब सम्हलने को है क्या है ये शोरो-गुल, क्यों धुआँ सा है शायद फिर कारवां निकलने को है तेरे संग तराशे थे जो नाजों से हमने
चलो रंगरेलिया मनाएं, कहां छिपी होली है बुरा नहीं मानेगी वह, भई आखिर होली है ! अनगिनत रंगों में तेरे मैं ढला हूं जिंदगी, पर बचा कालिख से ...