देवनागरी
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हिन्दी गजल

रूबरू मंगळवार, ०६ मे २००८, ००:३६ (+०५:३०)

वाचून बघा वाचून बघा

वो बैठे हैं रूबरू और शाम ढलने को है
दरमियाँ का शीशा अब पिघलने को है
छोड़ आया बीच मझधार यादों को तेरी
डूबती यह नैया अब सम्हलने को है
क्या है ये शोरो-गुल, क्यों धुआँ सा है
शायद फिर कारवां निकलने को है
तेरे संग तराशे थे जो नाजों से हमने

होली ( हिन्दी गजल ) शुक्रवार, २१ मार्च २००८, ००:३७ (+०५:३०)

वाचून बघा वाचून बघा

चलो रंगरेलिया मनाएं, कहां छिपी होली है
बुरा नहीं मानेगी वह, भई आखिर होली है !
अनगिनत रंगों में तेरे मैं ढला हूं जिंदगी, पर
बचा कालिख से ...