मानसमणिमाला (१७)
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हिंदी : लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ ॥ बा. कं १.६.५
उघरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहू ॥ ६ ॥
किएहु कुबेष साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ॥ ७ ॥
मराटी : बघुनि सुवेषहि जग-वंचक जे । वेष बलें पुजिले हि जाति ते ॥ प्रज्ञा - बा. कां. १.६.५
बेंड फुटे अंति न निर्वाहू । कालनेमि रावण इव राहू ॥ ६ ॥
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